सोयाबीन उत्पादन में आत्मनिर्भरता की राह, वैज्ञानिक तकनीकों से बदलेगी खेती की तस्वीर — डॉ. कुँवर हरेन्द्र सिंह
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इंदौर। इंदौर स्थित राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. कुँवर हरेन्द्र सिंह ने कहा है कि देश में सोयाबीन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक और किसानों के साथ मजबूत समन्वय बेहद आवश्यक है। उनके अनुसार, सोयाबीन न केवल किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम है, बल्कि यह देश की पोषण सुरक्षा और तेल उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
डॉ. सिंह ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में सोयाबीन की खेती का दायरा तेजी से बढ़ा है और यह फसल किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बनकर उभरी है। उन्होंने कहा कि सोयाबीन में उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन और तेल पाया जाता है, जिससे इसकी मांग घरेलू और औद्योगिक दोनों क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही है।

संस्थान द्वारा किए जा रहे अनुसंधान कार्यों पर प्रकाश डालते हुए निदेशक ने कहा कि वैज्ञानिकों की टीम ऐसी उन्नत किस्मों के विकास पर कार्य कर रही है, जो अधिक उत्पादन देने के साथ-साथ कीट एवं रोगों के प्रति प्रतिरोधी हों। इसके साथ ही कम अवधि में पकने वाली तथा सूखा एवं अधिक वर्षा जैसी परिस्थितियों को सहन करने वाली किस्मों पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मार्गदर्शन में संचालित यह संस्थान आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने में भी अग्रणी है। डॉ. कुँवर हरेन्द्र सिंह के अनुसार, जैव प्रौद्योगिकी, डिजिटल कृषि और प्रिसिजन फार्मिंग के माध्यम से खेती को अधिक वैज्ञानिक और लाभकारी बनाया जा रहा है।

किसानों तक अनुसंधान का लाभ पहुंचाने के लिए संस्थान द्वारा विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। डॉ. सिंह ने बताया कि समय-समय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशालाएं और खेत-स्तरीय प्रदर्शन आयोजित किए जाते हैं, जिनके माध्यम से किसानों को नई तकनीकों और उन्नत बीजों की जानकारी दी जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “जब तक शोध का लाभ सीधे किसानों तक नहीं पहुंचेगा, तब तक उसका वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होगा।”
इसी कड़ी में संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. अभिषेक भारतीय ने भी सोयाबीन उत्पादन की वर्तमान स्थिति और चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में कीट एवं रोग प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है, जिसके लिए समेकित कीट प्रबंधन (IPM) तकनीकों को अपनाना आवश्यक है।

डॉ. अभिषेक भारतीय ने कहा कि किसान यदि समय पर बुवाई करें, अनुशंसित बीजों का उपयोग करें और संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाएं, तो उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। उन्होंने यह भी जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए वैज्ञानिक पद्धतियों का पालन करना अत्यंत जरूरी है।
उन्होंने आगे कहा कि संस्थान द्वारा विकसित उन्नत तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, और किसानों की भागीदारी से ही इन तकनीकों का सही लाभ मिल सकता है।
उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर डॉ. कुँवर हरेन्द्र सिंह ने कहा कि किसानों को समय पर बुवाई, संतुलित उर्वरक उपयोग, उचित जल प्रबंधन और कीट-रोग नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे वैज्ञानिक सलाह का पालन करें और संस्थान द्वारा सुझाई गई तकनीकों को अपनाएं।
जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए निदेशक ने कहा कि अनियमित वर्षा और तापमान में उतार-चढ़ाव कृषि क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती हैं। इस दिशा में संस्थान लगातार अनुसंधान कर रहा है ताकि ऐसी किस्में विकसित की जा सकें जो विपरीत परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन दें।

भविष्य की योजनाओं के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. कुँवर हरेन्द्र सिंह ने कहा कि संस्थान सोयाबीन के मूल्य संवर्धन पर विशेष ध्यान देगा। इसके तहत सोया आधारित उत्पादों के प्रसंस्करण और विपणन को बढ़ावा दिया जाएगा।
अंत में, दोनों वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की कि वे नई तकनीकों को अपनाएं और वैज्ञानिक पद्धतियों के अनुसार खेती करें, जिससे उत्पादन और आय दोनों में वृद्धि हो सके। राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान इस दिशा में निरंतर प्रयासरत है और देश में सोयाबीन उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है।


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