मानव–हाथी द्वंद्व पर मंथन: बिलासपुर में राज्य स्तरीय कार्यशाला, वैज्ञानिक प्रबंधन पर जोर

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अचानकमार टाइगर रिज़र्व और वन चेतना केंद्र में जुटे अधिकारी–विशेषज्ञ, तकनीक और सह-अस्तित्व पर सहमति

बिलासपुर राज्य में लगातार सामने आ रहे मानव–हाथी द्वंद्व की घटनाओं को नियंत्रित करने और इसके स्थायी समाधान की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया। मंगलवार को वन चेतना केंद्र, बिलासपुर में वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग तथा प्रबंधन के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में वैज्ञानिक प्रबंधन, आधुनिक तकनीक और जमीनी अनुभवों के आधार पर रणनीति तैयार करने पर व्यापक चर्चा हुई।


विधायक धर्मजीत सिंह ने किया शुभारंभ

कार्यशाला का शुभारंभ ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि वे स्वयं वन परिवार से जुड़े रहे हैं और वनों व वन्यप्राणियों की सुरक्षा उनके लिए भावनात्मक विषय है। उन्होंने वन एवं वन्यप्राणियों को क्षति पहुंचाने वाले अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि संरक्षण तभी संभव है जब कानून का प्रभावी पालन हो।

इस अवसर पर अचानकमार टाइगर रिज़र्व की उपलब्धियों और स्वैच्छिक ग्राम विस्थापन पर आधारित एक विशेष वीडियो का विमोचन भी किया गया।


जमीनी अनुभवों से बनेगी प्रभावी रणनीति

कार्यशाला की अध्यक्षता प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) अरुण पांडे ने की। उन्होंने कहा कि मानव–हाथी द्वंद्व जैसी जटिल समस्या का समाधान केवल कागजी योजनाओं से नहीं, बल्कि फील्ड स्टाफ के अनुभवों और सुझावों से निकलेगा। उन्होंने जमीनी कर्मचारियों से मिले इनपुट को रणनीति का आधार बनाने पर बल दिया।


‘सजग ऐप’ से हाथियों की निगरानी

मुख्य वन संरक्षक, बिलासपुर वृत्त मनोज कुमार पांडेय और वनमंडलाधिकारी कटघोरा कुमार निशांत ने ‘सजग ऐप’ के जरिए हाथियों की ट्रैकिंग और निगरानी प्रणाली की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रियल टाइम अलर्ट से ग्रामीणों को समय रहते सतर्क किया जा सकता है, जिससे जान–माल की क्षति कम होगी।


वन्यजीव गलियारों का संरक्षण जरूरी

भारत सरकार की प्रोजेक्ट एलिफेंट मॉनिटरिंग कमेटी के सदस्य मंसूर खान ने वन्यजीव गलियारों (कॉरिडोर) के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हाथियों का आवागमन प्राकृतिक प्रक्रिया है और सुरक्षित गलियारों का संरक्षण मानव–वन्यजीव सह-अस्तित्व की बुनियाद है। वन क्षेत्रों में पर्याप्त चारा, स्वच्छ जल और आसपास के गांवों में जनजागरूकता को उन्होंने अत्यंत आवश्यक बताया।


सैटेलाइट कॉलर और वैज्ञानिक अध्ययन पर जोर

हाथी विशेषज्ञ प्रभात दुबे ने छत्तीसगढ़ में हाथियों के मूवमेंट पैटर्न, मौसमी आवागमन, झुंड संरचना, लोनर और मस्थ हाथियों के व्यवहार पर आधारित अध्ययन प्रस्तुत किया। उन्होंने हाथियों पर सैटेलाइट कॉलर लगाने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि इससे बेहतर प्रबंधन और सटीक पूर्वानुमान संभव होगा। उन्होंने यह भी कहा कि हाथी आवास विकास योजनाओं से द्वंद्व में स्वतः कमी आएगी।


एआई और कोयम्बटूर मॉडल पर चर्चा

सरगुजा वन मंडलाधिकारी अभिषेक जोगावत ने सरगुजा क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। वहीं कोयम्बटूर के डॉ. नवनीतन सुब्रमण्यम ने बताया कि भारत में अधिकांश हाथी संरक्षित क्षेत्रों के बाहर रहते हैं, जिससे द्वंद्व बढ़ता है। उन्होंने मॉडल के आधार पर हॉटस्पॉट मैपिंग, एआई आधारित मॉनिटरिंग और ‘फील्ड मैनुअल 2022’ के अनुसार राज्य-विशिष्ट कार्ययोजना पर जोर दिया।


बेहतर समन्वय पर सहमति

मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी), रायपुर सतोविशा समाझदार ने संरक्षित क्षेत्रों और सामान्य वन मंडलों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई। वहीं मीतू गुप्ता ने सभी सत्रों में आए महत्वपूर्ण बिंदुओं का समेकन प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम का समापन अचानकमार टाइगर रिज़र्व के उप संचालक द्वारा आभार प्रदर्शन के साथ हुआ।


रायपुर, बिलासपुर और सरगुजा वृत्त के वरिष्ठ वन अधिकारी, विशेषज्ञ और फील्ड स्टाफ की सक्रिय सहभागिता के साथ यह कार्यशाला संपन्न हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक, वैज्ञानिक अध्ययन और जनभागीदारी के समन्वय से ही मानव–हाथी द्वंद्व का स्थायी समाधान संभव है। यह कार्यशाला इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण और निर्णायक पहल के रूप में देखी जा रही है।

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